तेलंगाना विधानसभा ने दो बिल पास कर पिछड़े वर्गों को 42 प्रतिशत आरक्षण देने का रास्ता साफ कर दिया है. अगर ये बिल कानून बन जाते हैं तो आरक्षण 70 प्रतिशत हो जाएगा, जो सुप्रीम कोर्ट की 50 प्रतिशत सीमा का उल्लंघन होगा.
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के नेतृत्व में राज्य की कांग्रेस सरकार द्वारा लाए गए दोनों बिल तेलंगाना विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित हुए. इन्हें बीआरएस, बीजेपी, एआईएमआईएम और सीपीआई का भी समर्थन मिला. लेकिन इन बिलों को संविधान में संशोधन किए बिना, कानून नहीं बनाया जा सकता है.
लिहाजा अब इन्हें केंद्र सरकार के पास भेजा जाएगा. रेड्डी ने कहा है कि वो सभी पार्टियों के प्रतिनिधियों के साथ दिल्ली जाएंगे और संविधान में संशोधन करवाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलेंगे. इससे पहले बीआरएस सरकार ने पिछड़े वर्गों के लिए 37 प्रतिशत आरक्षण लाने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा था. राज्य की कांग्रेस सरकार उस प्रस्ताव को वापस लेकर यह नया प्रस्ताव भेजेगी.
विधेयकों का असर
इनमें से पहले विधेयक का नाम है तेलंगाना बैकवर्ड क्लासेस, शिड्यूल्ड कास्ट एंड शिड्यूल्ड ट्राइब्स (रिजर्वेशन इन एजुकेशन एंड अपॉइटन्मेंट्स इन स्टेट सर्विसेज) 2025 है. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इसमें प्रस्ताव दिया गया है कि राज्य में सरकारी शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों के लिए 42 प्रतिशत, अनुसूचित जातियों के लिए 18 प्रतिशत और अनुसूचित जनजातियों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए.
मौजूदा व्यवस्था में राज्य में इन समुदायों के लिए 29, 15 और छह प्रतिशत आरक्षण है. दूसरे बिल का नाम है तेलंगाना बैकवर्ड क्लासेस (रिजर्वेशन इन रूरल एंड अर्बन लोकल बॉडीज) 2025. इसके तहत स्थानीय निकायों के चुनावों में पिछड़े वर्गों को 42 प्रतिशत आरक्षण दिया जाने का प्रावधान है.
लैटरल एंट्री में आरक्षण का सवाल
राज्य सरकार का कहना है कि ये प्रस्ताव हाल ही में कराए गए जातिगत सर्वेक्षण के आधार पर दिए गए हैं, जिनमें सामने आया कि राज्य में पिछड़े वर्गों की आबादी 56 प्रतिशत है. लेकिन अगर ये बिल लागू होते हैं तो इनसे राज्य में आरक्षित सीटों का आंकड़ा 70 प्रतिशत हो जाएगा, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन होगा. देश की सर्वोच्च अदालत ने यह सीमा 1992 में इंदिरा साहनी मामले में दिए गए अपने फैसले में लगाई थी.
तमिलनाडु का उदाहरण
सुप्रीम कोर्ट की इस सीमा को लांघने की कोशिशें कई राज्य पहले कर चुके हैं, लेकिन हर बार अदालतों ने इन प्रस्तावों को ठुकरा दिया. सिर्फ तमिलनाडु में इस सीमा से ज्यादा 69 प्रतिशत तक आरक्षण है. इसे लागू करने के लिए 1993 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जे. जयललिता के नेतृत्व में एआईएडीएमके सरकार ने केंद्र को एक प्रस्ताव भेजा था कि तमिलनाडु के आरक्षण के प्रावधान को संविधान की नौवीं अनुसूची में डाल दिया जाए.
इस अनुसूची (शिड्यूल) के तहत आने वाले कानूनों को अदालतों में चुनौती नहीं दी जा सकती है. केंद्र में उस समय पीवी नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार थी. केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया और तमिलनाडु के आरक्षण बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई. संविधान में संशोधन कर दिया गया और बिल की नौवीं अनुसूची में डाल दिया गया.
आरक्षण के अंदर भी आरक्षण मिला
तेलंगाना की कांग्रेस सरकार भी अब कुछ ऐसा ही करने की कोशिश में है. देखना होगा कि उसे केंद्र में एनडीए सरकार का समर्थन मिलता है या नहीं.